लेख | ARTICLE



चाणक्य नीति

   
  • एक श्रेष्ठ पुत्र वही है जो किसी भी स्थिति में अपने पिता की आज्ञा का पालन करे यानि पिता-भक्त बना रहे, चाहे वह पुत्र किसी भी बड़े शिखर पर क्यों ना पहुँच जाये किन्तु उसे सदा अपने पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए।

 

  • एक श्रेष्ठ पिता वही है जो अपनी संतान (पुत्र-पुत्री) का अच्छे से लालन पालन करे और उनके अंदर अच्छे संस्कारो के बीज बोये। 

 

  • एक श्रेष्ठ पत्नी वही है जो अपने पति के कल्याण को अपना कल्याण माने और अपने पति को सुख दे। 

 

  • एक दुष्ट मित्र का हमेशा त्याग करे क्योकि वह आपके सामने अपनी चिकनी चुपड़ी बाते करेगा किन्तु पीठ पीछे आपकी बुराई करेगा। तो ऐसे धूर्त व्यक्ति कभी विश्वास किये जाने योग्य नहीं है। 

 

  • एक श्रेष्ठ मित्र वही है जो विश्वास लायक हो , जो सुख दुःख, अमीरी गरीबी सबमे एक सामान रहे। 

 

  • चाहे मित्र श्रेष्ठ हो या दुष्ट उस पर हद से ज्यादा विश्वास ना करे , अपने रहस्य को इनसे छुपा के रखे क्योकि क्रोधित अवस्था में वही मित्र आपके भेद को ओर लोगो के सामने खोल सकता है।

 

  • एक बुद्धिमान पिता को अपनी संतान को अच्छे गुणों से पोषित करना चाहिए क्योकि गुणवान और शीलवान व्यक्ति की ही कुल में पूजा होती है।  

 

  • वे माता-पिता अपनी संतान के महाशत्रु है जिन्होंने अपनी संतान को शिक्षा नहीं दिलाई क्योकि अनपढ़ और मुर्ख व्यक्ति विद्वानों की सभा में ठीक उसी प्रकार अपमानित होता है जैसे हंसो के बीच बगुला। 

 

  • एक टेढ़े-मेढे पेड़ को काटने की अपेक्षा सीधे पेड़ को आसानी से काट दिया जाता है ठीक इसी प्रकार इस दुनिया में सीधे व्यक्ति को सबसे पहले ठगा जाता है तो चंट-चालाक बने।

 

  • दुष्ट मित्र और सर्प में समानता की जाय तो सर्प श्रेष्ठकर है क्योकि सर्प तो काल आने पर काटता है किन्तु वह दुष्ट मित्र तो पग-पग पर काटेगा। 

 

  •  मुर्ख व्यक्ति को हमेशा त्यागना चाहिए क्योकि दिखने में वह इंसान है किन्तु वह दो पैरो वाला पशु है जो वचनरूपी बाणो से आपके मन मस्तिष्क को भेद सकता है।    

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ